आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

धनुष हो गया भंग

                
                                                         
                            नदिया प्यासी रह गई बह गया सारा जल
                                                                 
                            
बाहें खाली रह गईं घाट बचा. दलदल .

प्रेम में डूबे लोग कुछ जा पहुँचे जब घाट
उठी तरंगे हृदय में. रहे जोहते बाट .

बहती धार में काठ का टुकड़ा जैसे जाय
विरही मन भी पात सा बार बार उतराय .

यादें सारी बह गयीं उस धार नदी के संग
प्रत्यंचा मन की खिंची धनुष हो गया भंग.

सावन भादों में रहीं. ऐसी कुछ बौछार
आंगन सूखा ही रहा मिला कहीं ना प्यार.

दिनेश चौहान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर