विज्ञापन

चील कौओं की खूब बन आई

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शिकार भेड़ियों ने किये दावत सियारों ने उड़ाई
        
                                                    
                            
चील कौओं की बचे सामान में खूब बन आई.

सफ़र करते कटी जिन्दगी दूसरों के कन्धों पर
कभी खुद के पैरों पर चलने की नौबत न आई.

लोग बेवकूफी करते रहे आदतें पुरानी उनकी
कुछ समझदार लड़ते रहे कुर्सियों की लड़ाई.

फ़सल जब भी तैयार हुई काटने पहुँचे लोग
आंखें जिनकी खेतों की मेंड़ भी नहीं ढूंढ पाई.

जम्हूरियत खेल बन गया राजशाही लोगों का
कीमतें हर बार बेचारी इस जनता ने ही चुकाई.
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile