विज्ञापन

अब आकाश की बारी है

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            टूट गये सम्बन्ध आपसी पैसा लेकर बैठे हैं
        
                                                    
                            
फंसे बाढ़ में घर के अंदर सरकारों पर ऐंठे हैं.

पानी बिजली राशन मांगें बैठ के सब कोस रहे
अपनी करतूतों का लेखा कोई नहीं ये बोल रहे.

पेड़ सुखाये सड़क बनाई पीपल बरगद छांट रहे
जो बोया है कल तक सबने आज वही काट रहे.

पर्वत नंगे भवन हैं चंगे गमलों की हरियाली से
बाढ़ का पानी रोक रहे हैं कागज वाले बांधों से.

मिट्टी जल को दूषित कर वायु बिगाड़ी भी हमने
अब आकाश की बारी है अग्नि जलाई मिल सबने.
-दिनेश चौहान
5 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

User

1 कविता

View Profile

Deepak Sharma

24 कविताएं

View Profile