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अब आकाश की बारी है

                
                                                         
                            टूट गये सम्बन्ध आपसी पैसा लेकर बैठे हैं
                                                                 
                            
फंसे बाढ़ में घर के अंदर सरकारों पर ऐंठे हैं.

पानी बिजली राशन मांगें बैठ के सब कोस रहे
अपनी करतूतों का लेखा कोई नहीं ये बोल रहे.

पेड़ सुखाये सड़क बनाई पीपल बरगद छांट रहे
जो बोया है कल तक सबने आज वही काट रहे.

पर्वत नंगे भवन हैं चंगे गमलों की हरियाली से
बाढ़ का पानी रोक रहे हैं कागज वाले बांधों से.

मिट्टी जल को दूषित कर वायु बिगाड़ी भी हमने
अब आकाश की बारी है अग्नि जलाई मिल सबने.
-दिनेश चौहान
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4 घंटे पहले

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