संघर्ष अभी शेष है
सृजन का बीज अमर रहे,
यही समय की पुकार है,
आने वाले स्वर्ण प्रभात का,
आज स्वयं आधार है।
होठों पर कल का मधुर स्वप्न,
हाथों में श्रम की तलवार है,
होठों पर कल का मधुर स्वप्न,
आज संघर्ष अपार है।
हर माथे का पसीना
अब इतिहास नया लिखता है, पत्थर-पत्थर में भी
श्रम का अंकुर चुपचाप दिखता है।
वृद्ध वटों की आँखों में भी
नवयुग का विश्वास जगा,
हर धड़कन में परिवर्तन का
प्रखर अग्नि-उल्लास जगा।
विनाश नहीं,
निर्माणों का यह पावन उत्सव भारी है, होठों पर कल का मधुर स्वप्न,
आज संघर्ष जारी है।
धरती ने फिर बाँह पसारी,
बीजों को आशीष दिया,
सूखी डाली ने भी देखो,
नव पल्लव का गीत लिया।
आँधी जितनी तेज़ चली हो,
दीप नहीं घबराते हैं,
अंधकार के सबसे गहरे क्षण ही
प्रभात बुलाते हैं।
नीले अम्बर पर आशाओं की
स्वर्णिम चित्रकारी है,
होठों पर कल का मधुर स्वप्न,
आज संघर्ष जारी है।
टूटी बेड़ियाँ पुकार रही हैं—
अब रुकना स्वीकार नहीं,
अन्यायों की ऊँची दीवारें
अब पहले-सी दुर्गम नहीं।
जन-जन की जागी चेतना ने
परिवर्तन का शंख बजाया,
हर श्रमिक ने अपने श्रम से
भाग्य स्वयं लिखना सिखलाया।
हर उद्घोष में मानवता की
नवगाथा की तैयारी है,
होठों पर कल का मधुर स्वप्न,
आज संघर्ष जारी है।
जो गिरकर फिर उठ जाते हैं,
वही शिखरों तक जाते हैं,
जो आँसू को शक्ति बना लें,
वे इतिहास रच जाते हैं।
कल की उजली मुस्कानों का मूल्य आज चुकाना होगा,
स्वर्णिम युग के स्वागत में
हर पग आगे बढ़ाना होगा।
संकल्पों की तपती भट्ठी ही
भविष्य की फुलवारी है,
होठों पर कल का मधुर स्वप्न,
आज संघर्ष जारी है।
आओ ऐसा कर्म करें कि
आने वाला युग मुस्काए,
हमसे आगे चलने वाली पीढ़ी गौरव-गीत सुनाए।
सत्य, श्रम और प्रेम-दीप से
जीवन-पथ आलोकित हो,
मानवता के मंगल-स्वर से
विश्व-हृदय स्पंदित हो।
सृष्टि रहे, संस्कृति रहे—
यही हमारी जिम्मेदारी है,
होठों पर कल का मधुर स्वप्न,
आज संघर्ष जारी है। आज संघर्ष जारी है।
-दिनेश चन्द्र गुरुगरिया "द्विज"