कर-स्पर्श का अमर आलोक
जब तुम अपने स्नेहिल कर-कमलों में मेरा कर धारण कर लेते हो,
तब ऐसा प्रतीत होता है
मानो समस्त चराचर जगत
क्षणभर के लिए
अपनी गति विस्मृत कर बैठा हो।
काल का अनवरत चक्र
अचानक निःशब्द हो जाता है,
दिशाएँ विस्मय से निहारने लगती हैं, समीर अपनी गति रोककर
हमारे मौन संवाद को सुनने लगता है, और प्रकृति
अपनी समस्त चंचलता त्यागकर
प्रेम की आराधना में निमग्न हो जाती है।
तुम्हारी वह एकमात्र दृष्टि—
कितनी सरल, कितनी निष्कपट, कितनी निर्मल!
वह मेरे अन्तःकरण के
उन अज्ञात प्रदेशों तक पहुँच जाती है, जहाँ शब्द कभी पहुँच नहीं पाते।
उस एक दृष्टि के स्पर्श से
मेरे नेत्रों में स्नेह का नवप्रभात
खिल उठता है,
और हृदय में अनगिनत भाव-कमल स्वतः विकसित हो जाते हैं।
तुम्हारे करों की उष्णता में
केवल स्पर्श नहीं, अपितु
विश्वास का अमृत प्रवाहित होता है।
वहाँ सुरक्षा है, समर्पण है,
अटूट अपनत्व है,
और वह मौन प्रतिज्ञा भी,
जो बिना उच्चारित हुए
जीवनपर्यन्त साथ निभाने का
आश्वासन देती है।
जब मेरी अँगुलियाँ
तुम्हारी अँगुलियों से मिलती हैं,
तब ऐसा लगता है मानो
दो पृथक् धाराएँ
अपने आदि-स्रोत को पहचानकर
एक ही सागर में विलीन होने चली हों। उस क्षण मैं स्वयं को तुमसे पृथक् नहीं, अपितु तुम्हारे अस्तित्व का
एक स्वाभाविक विस्तार
अनुभव करता हूँ।
तुम्हारा सान्निध्य मेरे
समस्त संतापों का शमन है।
मन की व्याकुल तरंगें
शान्त सरोवर की
निस्तरंग जलराशि बन जाती हैं। चिन्ताएँ, भय, एकाकीपन, विषाद— सब तुम्हारे स्नेह के प्रकाश में
रात्रि के तम के समान
स्वतः विलीन हो जाते हैं।
तुम्हारी मुस्कान मेरे जीवन का उषःकाल है।
तुम्हारी वाणी
मेरे अन्तर की वीणा का मधुर स्वर है। तुम्हारा मौन भी इतना अर्थपूर्ण है
कि उसमें सम्पूर्ण जीवन का
अलिखित गीत सुनाई देता है।
अब मुझे
स्वर्ण-मण्डित महलों का आकर्षण नहीं,
यश की चकाचौंध नहीं,
वैभव का अभिमान नहीं।
यदि कुछ चाहिए,
तो केवल इतना—
तुम्हारा वह विश्वास,
जो मेरे प्रत्येक संघर्ष में
मुझे अडिग बनाता है;
तुम्हारा वह कर-स्पर्श,
जो मेरी प्रत्येक दुर्बलता को
साहस में परिवर्तित कर देता है।
यदि जीवन एक दीर्घ यात्रा है,
तो तुम उसके पथ-प्रदीप हो।
यदि हृदय एक निर्जन उपवन है,
तो तुम उसकी प्रथम वर्षा हो।
यदि आत्मा एक मौन वीणा है,
तो तुम उसके प्रथम स्पन्दन का संगीत हो।
तुम्हारे साथ समय केवल बीतता नहीं, अनन्त में रूपान्तरित हो जाता है।
क्षण शाश्वत बन जाते हैं,
मौन गीत बन जाता है,
और प्रेम केवल भावना न रहकर जीवन का परम सत्य बन उठता है।
यदि कोई मुझसे पूछे
कि इस विशाल जगत में
मेरा सबसे अमूल्य धन क्या है,
तो मैं निस्संकोच कहूँगा—
वह तुम्हारा स्नेहपूर्ण कर-स्पर्श है, जिसमें मुझे सम्पूर्ण सृष्टि का
संरक्षण मिलता है;
वह तुम्हारी करुणा से भीगी दृष्टि है, जिसमें मुझे अपने समस्त अस्तित्व का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है;
और वह तुम्हारा प्रेम है,
जो मुझे प्रतिक्षण
यह अनुभूति कराता है
कि दो शरीर भले पृथक् हों,
परन्तु जब आत्माएँ निष्कलुष स्नेह में एकाकार हो जाती हैं,
तब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी उनके प्रेम के आगे श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है।
-दिनेश चन्द्र गुरुगरिया "द्विज"