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भूल गए हैं हम गाँव

Dinesh Chandra Rankawat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खूब कमाया धन-दौलत, ऊँचे महलों का मान,
        
                                                    
                            
जग ने पहचाना हमको, पाया बड़ा सम्मान।
लेकिन मन के कोने में, उठता एक सवाल,
क्या खोकर यह सब पाया, कैसा यह प्रतिफल?

शहरों की चमक-दमक में, आँखें तो भर आईं,
पर स्मृतियों की पगडंडी, हर पल हमें बुलाती।
जहाँ धूल भी चंदन जैसी, माथे का श्रृंगार,
जहाँ हर चेहरे पर खिलता, अपनत्व का संसार।

वह तुलसी चौरे का दीपक, हर संध्या मुस्काता था,
दादी के कोमल स्वर में, हर आँगन गुनगुनाता था।
गोबर से लीपे आँगन में, पावन-सा त्योहार,
हर चौखट पर बसता था, प्रेम और सत्कार।

मिट्टी की सौंधी खुशबू, मन को मोह लिया करती,
पहली वर्षा की हर बूँद, जीवन में रस भरती।
सरसों के पीले खेतों में, सपनों की मुस्कान,
कोयल की मीठी तानों से, गूँज उठता था गान।

पीपल की वह गहरी छाया, बरगद का विस्तार,
अमुआ की डाली पर झूला, सावन का उपहार।
तालाबों की निर्मल लहरें, गायों की वह घंटी,
गोधूलि की पावन बेला, लगती जैसे आरती।

अब ऊँची-ऊँची इमारत हैं, शीशे के दरबार,
पर उनमें वह ऊष्मा कहाँ, जो थी कच्चे द्वार?
दरवाज़े तो खुल जाते हैं, पासवर्ड के साथ,
लेकिन मन के किवाड़ों पर, जमी हुई है राख।

पहले रिश्ते साँसों जैसे, सहज और निष्काम,
अब हर संबंध पूछता है, क्या होगा परिणाम?
पहले दुःख भी आधा होता, बाँट लेते सब लोग,
अब सुख के पर्वत पर भी, मन रहता है रोग।

त्योहारों की रौनक में, पूरा गाँव सजता था,
एक चूल्हे की रोटी से, सौ-सौ मन तृप्त होता था।
दीवाली केवल दीप नहीं, विश्वासों की ज्योति,
होली केवल रंग नहीं थी, प्रेम-हृदय की प्रीति।

दादी की मीठी लोरी में, वेदों का था सार,
माँ की ममता में मिलता था, ईश्वर का आकार।
चन्दा-मामा की कथाओं में, उड़ते थे अरमान,
तारों की छाँव तले पलता, निर्मल हिन्दुस्तान।

अब मोबाइल की रोशनी ने, चंदा छीन लिया,
बचपन की मुस्कानों से, आँगन रिक्त किया।
खेल खिलौनों से बढ़कर, स्क्रीनें बन गईं मित्र,
मासूमी की पुस्तक पर, खिंच गया कृत्रिम चित्र।

पहले आधी रोटी में भी, तृप्त हृदय हो जाता,
अब पकवानों के सागर में, मन भूखा रह जाता।
पहले निर्धनता हँसती थी, प्रेम धनी था गाँव,
अब सम्पन्नता रोती है, सूना हुआ स्वभाव।

शिक्षा आई, ज्ञान बढ़ा, यह शुभ परिवर्तन है,
पर यदि मानव भूल गया मन, कैसा यह जीवन है?
विज्ञानों की ऊँचाई भी, तब तक अधूरी है,
जब तक अपनी जन्मभूमि से, प्रीति न पूरी है।

चलो लौट चलें स्मृतियों में, फिर वह दीप जलाएँ,
तुलसी चौरे, पीपल, नीम को फिर से गले लगाएँ।
बच्चों को फिर मिट्टी से, जीवन का पाठ पढ़ाएँ,
रिश्तों की सूखी धरती पर, प्रेम-नदी बहाएँ।

शहर आवश्यक हैं लेकिन, गाँव हमारी जड़ है,
यहीं संस्कृति की गंगा, यहीं सभ्यता का घर है।
जिस दिन अपनी मिट्टी से, फिर जुड़ जाएगा गाँव,
भारत फिर से गा उठेगा, अपना अमर सुहाव।

आओ ऐसा युग रचें, जहाँ दोनों का मान,
शहरों की प्रगति रहे और, जीवित रहे गाँव।
धन, वैभव, विज्ञान सभी हों, मानवता की छाँव,
सुनो द्विज की वरना इतिहास यही कहेगा—
"शहर तो बसते रहे, मगर खो गए गाँव।"
-दिनेश चन्द्र गुरुगरिया"द्विज"
 
3 महीने पहले
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