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आज सुण्यो सखी.......

Dinesh Chandra Rankawat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज सुण्यो सखी, म्हारा साजन जोग धरबा चाल्या,
        
                                                    
                            
म्हाणे दान में छोड़ विरह रो अगणित दुख दे जाल्या।

सावण रो महीनो, घणा घणा बदरा बरसै,
ऐसी बेला घर-आंगण छोड़, जोग कद सूँ सरसै?

मेघां री धारां में भभूत कद तलक टिक पावै?
भीजतां-भीजतां वैराग रो रंग कद तलक निभावै?

सुणूं आज गेरूआ बाणा तन पै ओढ़सी,
राणी, राज-पाट, सब छोड़ दूर कदीं होड़सी।

मन में जद प्रेम रो अमृत अजूं छलकाय,
तो फेर बाहरी जोग कदे आतम सुख दिलाय?

साचो जोग तो प्रेम है, साचो तप अनुराग,
बाकी सब दिखलावो लागै, मन रो कोरौ फाग।

म्हैं तो उन री प्रीत में मन गैरिक रंग रँगायो,
अंग-अंग नै उन री सुध सूँ चंदन-गंध बसायो।

साजन री लगन में मन जोगी पहलां थई गयो,
अब घर-आंगण छोड़ कै ओ क्यूँ परदेसां लई गयो?

सखी, इक बार समझाय दे, यो मत करै विचार,
जोगी बन नै छोड़ गयो तो सूँणो होसी संसार।

चौमासे में साधु-संत भी इक ठांय टिक जावै,
फेर म्हारो साजन क्यूँ देस-परदेस भटकावै?

उन रो यो नवो जोग म्हारे जीवन रो शोक बनसी,
नैणां आगै ओ जोगी रूप कद सहणो बनसी?

म्हारी अरदास सखी, उन तक पँहुचाय दे आज,
प्रीत छोड़ जोग न धरै, संभाळै प्रेम रो राज।

"द्विज" जोग सूँ मोठो प्रेम है, प्रीतै परम उपास,
म्हारा साजन घर आवै, बस ए म्हारी अरदास।
-दिनेश चन्द्र 
3 महीने पहले
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