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आत्महत्या की पहेली और तुम्हारा हाथ...

dhirendra singh

Mere Alfaz
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                            आत्महत्या, इस शब्द को सुनते ही एक ख्याल आता होगा,
        
                                                    
                            
वो कायर था, उसमें सहने का दम नहीं था,

चलो तुम बताओ उसके जाने के बाद तुम समझ पाए,
कि क्या होगी उसके सहने की क्षमता,

बताओ तो यार उसने कभी तो तुमसे कहने की कोशिश की होगी,
तुम्हें कभी तो लगा होगा वो बेचैन हो रहा है,

लेकिन तुम्हारी पार्टी और दोस्तों में कुछ तो भूल गए होगे तुम,
जब उसके परिवार ने भी साथ छोड़ा होगा उसका साथ,

वो परिवार जिससे उसे उम्मीद होगी सुनने की,
चलो बेटा तुम गलत हो तो क्या हुआ हम तो हैं,

वो आत्महत्या करने से पहले तुमसे भी सुनना चाहता होगा,
चलो यार हम तो हैं, लेकिन...

लेकिन तुम्हारी भी तो पार्टी तो उसकी बातों ने फीकी कर दी होगी,
वहीं जिंदगी वाली पार्टी जहां तुम और तुम्हारे जैसे लोग मस्त रहते हैं,

वो आखिरी तक अपनी एक दूसरी दुनिया में होगा,
लेकिन फर्ज था हमारे समाज का उसे वहां से वापस ले आने का,

आत्महत्या कोई हल बिल्कुल नहीं है,
लेकिन आत्महत्या के अनसुलझे ख्याल में फंस गया था वो,

क्यों तुमने कभी जानने की कोशिश नहीं की,
अब रोकर और अफसोस जता क्या करोगे,
दोस्तों का यार और मां का प्यार तो गया,

अब भी देर नहीं हुई है,
समझ पाओ तो समझ लो,
आत्महत्या का ख्याल दलदल है,
किसी को बचाने के लिए हाथ बढ़ाना ही होगा।

*लखनऊ में यंग कपल के पांचवी मंजिल से कूदकर जान देने पर आाय ख्याल*

-धीरेन्द्र सिंह

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8 वर्ष पहले
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