स्मृति
तुम्हारी स्मृति
मेरे पलको पर बैठी हुई
अठखेलियाँ सी करती हैं
मेरे हृदय में घनीभूत होकर
कभी मेघ बनकर बरसती है
कभी कुहरो की धुंध बनकर
मस्तिष्क में छायी रहती है
तुम्हारी स्मृति
मुझे महसूस कराती है
तुम आस पास ही कहीं हो
धरती पर बिखरी ओस की बूंद
मुझे याद दिलाती हैं
तुम्हारे गले मे लिपटी हुई
मोतियों की माला की
तुम्हारी स्मृति
प्राणवायु के समान अंतस में उतरती है
और रोम रोम को प्रफुल्लित कर देती है
मेरे शून्य सदृश मानस में
दोलन गति करती हुई
मेरे अंग अंग में मानो
ऊर्जा का संचार करती रहती है
तुम्हारी स्मृति
को समय सीमा में बांधना सम्भव नही
वह स्वच्छंद विचरती है
हृदय की गहराइयों में
सांसों की तनहाइयों में
बार बार आभास दिलाती है
तुम यहीं हो यहीं कहीं हो
-धीरेंद्र सिंह