जाने कब से दिल किनारे से लगाए बैठा हूँ,
लहर आ आ के गुजर जाती है ॥
और क्या कहूँ बेवफ़ा के सिवा उसको,
जिसके इंतज़ार में मैं ख़ुद को भी भुलाये बैठा हूँ।... .
-देव बुलंदशहरी