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पुनः गांव की ओर चले

Devendra Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज जगा तो मन में आया
        
                                                    
                            
गांव का घर कैसा होगा
कैसा होगा वो घर-आंगन
जहां हम मिट्टी में खेले-कूदे
जिन आंगन में बीता बचपन
जिस मिट्टी से हाथ सने
वर्षो बीते जन्मस्थली देखें
चल पुनःगांव की ओर चले

आज वर्षो बाद मन किया
उन गलियों का रुख करें
जहां बचपन के निशान छुटे है
बेफिक्री में बीते बचपन की
धुंधली यादों के संग चलें
पुनः गांव की ओर चले

वो नंगे पेर मिट्टी में चलना
बारिश में छपछप करना
लड़-झगड़कर पलभर में
रुठने मनाने की स्मृतियों
के दौर को दोबारा याद करें
पुनः गांव की ओर चले

जी चाहता है फिर से जाऊं
वो आम-पीपल के छांव तले
उन टहनियों से तोड़ के लाऊं
दशहरी आम पके-पके
बीते बचपन को पुनः निहारूं
पुनः बचपन को याद करें
पुनः गांव की ओर चले

ढलती शामें, बढ़ती आयु,
पोते में अपना बचपन पाऊं
वो दूध में भीगी बासी रोटी,
रह-रहकर याद दिलाती है!
उम्र भले ही ढल जाए पर
यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं,
जी चाहता है वो घर निहारूं,
जहां अपना बचपन बीता
पुनः गांव की ओर चलूं!
- देव सिंह गढ़वाली
एक महीने पहले
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