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त्याग-समर्पण जिसका वेश।

Devendra Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जग के सारे बंधन मिथ्या,
        
                                                    
                            
क्षणभंगुर यह संसार,
प्रेम ही सत्य, प्रेम ही सुंदर,
प्रेम ही जीवन का आधार।

सच्चा प्रेम वही कहलाए,
जिसमें स्वार्थ न हो लेश,
निष्काम, निश्छल, निर्मल भावना,
त्याग-समर्पण जिसका वेश।

न तन का क्षणिक आकर्षण,
न भोग-विलास की चाह,
यह तो मन की निर्मल सरिता,
दो हृदयों की एक राह।

न क्षण भर का कोई आवेग,
न कुछ दिनों का बंधन,
सुख-दुःख में साथ निभाए जो,
वही प्रेम का सच्चा स्पंदन।

ज़माने के सितमों में तपकर,
प्रेम कुंदन-सा निखरता है,
हर कठिन परीक्षा की अग्नि में,
और गहरा, और पवित्र उतरता है।


दूरी भी जिसे तोड़ न पाए,
समय न जिसका मान घटाए,
आँधियाँ चाहे कितनी आएँ,
फिर भी दीपक बुझ न पाए।

जैसे सावन मोर को भाए,
जैसे दीपक-पतंग का नाता,
जैसे भक्त और प्रभु का बंधन,
वैसा हो प्रेम—
पावन, अनूठा और निश्छल नाता।

सच्चे मन से जिसने प्रेम किया,
वह प्रेम कहाँ मर पाता है?
देह मिटे, संसार मिटे,
प्रेम अमर रह जाता है।

जग के सारे बंधन मिथ्या,
मिथ्या यह संसार,
प्रेम ही सत्य, प्रेम ही सुंदर,
प्रेम ही जीवन का आधार।
-देवेंद्र भण्डारी
एक महीने पहले
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