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उल्फ़त की राहों का दस्तूर

Devendra Pant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अजब है तुम्हारी ग़ज़ब दास्तां,
        
                                                    
                            
करे तुमको परेशां, करे मुझको परेशां।

कभी धूप बन कर ये झुलसाए दिल,
कभी छांव हो कर बने मेहरबां।

न तुम ही समझ पाए इसके इशारे,
न मैं ही समझ पाया इसकी ज़बां।

मिले मोड़ इसमें कुछ ऐसे कि अब,
न कोई निशां है, न कोई मकां।

उल्फ़त की राहों का दस्तूर 'देव',
यहाँ ख़ाक होते हैं दोनों जहाँ।
-देवेन्द्र पंत
3 महीने पहले
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