अजब है तुम्हारी ग़ज़ब दास्तां,
करे तुमको परेशां, करे मुझको परेशां।
कभी धूप बन कर ये झुलसाए दिल,
कभी छांव हो कर बने मेहरबां।
न तुम ही समझ पाए इसके इशारे,
न मैं ही समझ पाया इसकी ज़बां।
मिले मोड़ इसमें कुछ ऐसे कि अब,
न कोई निशां है, न कोई मकां।
उल्फ़त की राहों का दस्तूर 'देव',
यहाँ ख़ाक होते हैं दोनों जहाँ।
-देवेन्द्र पंत