दुनिया से चेचक क्या उठा,दुनिया ही चेचक हो गयी,
जो मिले ताप-ओ-दाग, अब दोबारा आये तो जरा I
चेहरे तो सब चमकते रहे, पर रूहें सब बीमार हैं,
मर्ज़-ए-दिलों का अब कोई, चारा आये तो ज़रा।
इंसानियत के नाम पर, बस नफ़रतों का रक़्स है,
इस भीड़ में कोई शख़्स, हमारा आये तो ज़रा।
हम तो खड़े हैं धूप में, बरसों से इस उम्मीद में,
ज़ुल्फ़ों का तेरी कोई, साया आये तो ज़रा।
गुजारिश है 'देव' की, इस दौर के इंसान से,
शीशे के इस बाज़ार में, कोई पत्थर लाये तो ज़रा।
-देवेन्द्र पंत