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हमें मालूम न था

Devendra Pant

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमें मालूम न था वो भी होंगे महफ़िल में,
        
                                                    
                            
वर्ना अपनी सबसे क़ीमती अचकन पहनते हम।

फ़क़त लिबास ही नहीं, साज़-ओ-सामान भी होता,
वो पूछते हाल, तो लहजे में भी थोड़ा गुमाँ रखते हम।

वो न होते तो वही होता जो सोच रखा था,
रस्म अदा करते और बज़्म से निकलते हम।

'देव' उनके सामने तो ज़ब्त की हद हो गई,
वर्ना यूँ बे-दिली से महफ़िल में कब रहते हम।
-देवेन्द्र पंत
3 महीने पहले
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