कुछ रोज संभल जाओ फिर आजाद हो जाओगे।
माना बुरे इस दौर में कुछ पल न फिर से पाओगे
ए शहर रूका हुआ मगर ख्वाहिश गंवारा ही नहीं
आदत हुई तो हर बला ऐसे ही तुम सह जाओगे
कुछ किताबें आज बन्द दरवाजों के पीछे देख लो
फिर कहीं ऐसा न हो के ताऊम्र तुम पशताओगे
देव यदुवंशी
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें