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मर्यादा के दो किनारे

Devaki Nandan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक नदी के दो किनारे,
        
                                                    
                            
दोनों के बिना नदी का अस्तित्व नहीं।
एक किनारा सवाल पूछता है,
दूसरा किनारा उत्तर देता है।

नदी जब शांत होती है, तो किनारों को सींचती है
और जब रौद्र हो जाती है, तो उसे आपदा कहते हैं।

आज मंच बड़े हो गए हैं, आवाज़ें तेज़,
स्क्रीन छोटी है पर गूंज बहुत है।
एक तरफ जिज्ञासा है, दूसरी तरफ दायित्व,
बीच में बह रही है हमारी साझी सभ्यता।

सुना है अब लोग कहते हैं
ऊंची आवाज़ ही सच है क्या,
कड़ी भाषा ही ताकत है,
मर्यादा अब पुरानी किताब हैl

पर क्या शांत जल भी किनारे तोड़ता है,
क्या सभ्य संवाद से कभी रिश्ते टूटते हैं,

जो प्रश्न पूछे, वो शब्द भी संभाले
क्योंकि शब्दों से ही विश्वास बनता है।
जो उत्तर दे, वो धैर्य भी रखे
क्योंकि धैर्य से ही सम्मान बनता है।

नफ़रत एक दिन का शोर दे सकती है,
पर संवाद सदियों का रास्ता बनाता है।
आज जो हम सार्वजनिक चौपाल में बोएंगे,
वही कल हमारी अगली पीढ़ी काटेगी।

इसलिए याद रखिए,
आज़ादी का अर्थ मनमानी नहीं
और जवाबदेही का अर्थ अकड़ नहीं

तलवार और जुबान दोनों में धार है।
एक से दीवारें गिरती हैं, दूसरे से पुल बनते हैं।

शब्द साध लिए तो जग अपना है
और शब्द बिगड़ गए तो सब सपना है

नदी तभी जीवन देती है,
जब वो शांत रहकर दोनों किनारों को थामे रखती है।
चलो चलें सकारात्मकता अपनाएं ,
नकारात्मकता को दूर भगाएं
-देवकी नन्दन गहतोड़ी
2 महीने पहले
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