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तेरा हुस्न-ओ-जमाल

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरे जैसा कहीं शबाब नहीं,
        
                                                    
                            
हुस्न तुझ सा बेहिसाब नहीं।

जब से देखा तिरा रुख़े-रौशन,
फिर हमने देखा माहताब नहीं।

तेरी आँखों हैं छलकते प्याले,
ऐसी मयख़ाने में शराब नहीं।

तुझे ही ख़्वाब में सजाया था,
सामने तू है कोई ख़्वाब नहीं।

तेरी नज़रों का इंतिख़ाब हूँ मैं,
इस से उम्दा मिरा ख़िताब नहीं।

"शमीम" शरह-ए-जुनूँ इतनी है,
तू हमनशीं है तो इज़्तिराब नहीं।
- देवेन्द्र सचदेवा " शमीम"
एक दिन पहले
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