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साथ तुम होते तो

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            साथ तुम होते तो मंज़र और सुहाने लगते,
        
                                                    
                            
ये समाँ और ये नज़ारे सारे लुभाने लगते।

तुमको किसी बात पर शिक़वे या गिले होते,
रूठ जाते तुम तो हम तुमको मनाने लगते।

ये रहगुज़र ख़ूबसूरत और दिलनशीन होती,
मेरे हमराह बनके तुम साथ जो आने लगते।

तुमको भुलाने की जब हमने की कोशिशें,
और भी कुछ ज़ियादा याद तुम आने लगते।

जाते जाते एक बार मुड़कर तो देखते हमें,
और तुम्हें देख कर हम भी मुस्कुराने लगते।

"शमीम" दर-बदर हुए जब से तुमसे जुदा हुए,
अब कहीं भी न हमको अपने ठिकाने लगते।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
एक महीने पहले
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