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पैग़ाम-ए-नज़र

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख़ुद को तेग़-ए-निगह से कैसे बेअसर करूँ,
        
                                                    
                            
पैग़ाम-ए-नज़र को मैं कैसे दरगुज़र करूँ।

तू इब्दिता मेरी है और तू ही है इंतहा मेरी,
तू हमसफ़र है तो साथ उम्रभर सफ़र करूँ।

तेरा साथ हो तो और फिर क्या चाहिए मुझे,
तेरे हवाले हस्ती मेरी मैं सर-ब-सर करूँ।

बिन तेरे तो ज़िन्दगी बहुत बेरंग लगती है,
तेरे साथ ही गुज़र हर शाम-ओ-सहर करूँ।

मुश्किल कोई गर आए तेरी ज़िन्दगी में तो,
हमसाया तेरा बन के मैं ख़ुद को सिपर करूँ।

तेरी ज़ुल्फ के साए में है चैन-ओ-सुकूँ "शमीम"
गर हो इजाज़त तो मैं तेरे दिल में घर करूँ।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
एक महीने पहले
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