दर्द-ओ-ग़म ही मिले मोहब्बत में,
नहीं मिलता नहीं जो क़िस्मत में।
एक पत्थर को पूजते रहे हम,
कुछ न हासिल हुआ इबादत में।
भुला देते तुम्हें तुम्हारी तरह,
ये नहीं है हमारी फ़ितरत में।
वादे, क़समें निभाए भी जाएं,
ऐसा होता नहीं हक़ीक़त में।
हुए रुसवा दिल लगाकर हम,
कुछ न पाया तुम्हारी चाहत में।
तन्हा-ओ-वीरान ज़िंदगी हुई,
"शमीम" जी रहे हैं ख़ल्वत में।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"