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मेरी दीवानगी

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ऐ सनम मेरी इब्दिता तुम हो,
        
                                                    
                            
जुस्तजू थी वो इंतहा तुम हो।

तुम्हें पाया तो सब कुछ पा लिया,
मैंने माँगी थी जो दुआ तुम हो।

तुम मिले और अब क्या चाहिए,
ज़हे-नसीब है आश्ना तुम हो।

तुम्हारे इश्क का मरीज़ हूँ मैं,
और इस मर्ज़ की दवा तुम हो।

ख़यालों और ख़्वाबों में तुम्हीं,
जिधर देखूं जा-ब-जा तुम हो।

मेरी दीवानगी की हद तो देखो,
मैं कहता हूँ मेरे ख़ुदा तुम हो।

"शमीम" और तुम से क्या कहूँ मैं,
मेरी हमदम-ओ-हमनवा तुम हो।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
एक दिन पहले
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