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ख़्वाब उनके

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रुख़ से पर्दा हटाए बैठे हैं,
        
                                                    
                            
हम पे सितम ढाए बैठे हैं।

खिले हैं लब तबस्सुम से,
और हमको लुभाए बैठे हैं।

उनकी अदाओं पर हम तो,
अपनी हस्ती लुटाए बैठे हैं।

बेख़बर हैं इस हक़ीक़त से,
हमारा दिल चुराए बैठे हैं।

हम पर मेहरबाँ हो जाएं वो,
उम्मीद हम जगाए बैठे हैं।

"शमीम" दिल में बस गए हैं वो,
ख़्वाब उनके सजाए बैठे हैं।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
2 महीने पहले
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