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ख़ूबसूरत रहगुज़र

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बड़ी ख़ूबसूरत है ये रहगुज़र,
        
                                                    
                            
इनायत तुम्हारी मेरे हमसफ़र।

तुम आए तो बदल गई फ़िज़ा,
बहुत दिलनशीन हुआ है मंज़र।

मेरे सामने यूँ ही बैठे रहो,
तुम्हें देखती रहे मेरी नज़र।

आमद हुई तेरी; फूल खिल गए,
ख़ुशबू चमन में गई है बिखर।

तुम्हीं बस रहे थे मेरे ख़्वाब में,
तुम्हारे ही दिल में बनाना है घर।

हम बेख़ुद से रहते हैं शाम-ओ-सहर,
"शमीम: इश्क़ का ये हुआ है असर।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
एक दिन पहले
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