हकीक़त को छुपाया जा रहा है,
दरोग़ सब बताया जा रहा है।
फ़रेब ही नज़र आता है हर सू,
ख़्वाब झूठा दिखाया जा रहा है
नाम पर जात और मज़हब के,
हम सभी को लड़ाया जा रहा है।
उजाला देखकर भरमा न जाना,
किसी का घर जलाया जा रहा है।
सर झुकाकर जो कभी आते थे,
उन्हीं को सर झुकाया जा रहा है।
सुना है आज-कल तो मंदिरों का,
चढ़ावा भी चुराया जा रहा है।
"शमीम" हर तरफ तिजारत है,
और हमें बरग़लाया जा रहा है।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"