इश्क़ो-उल्फ़त के दिलनशीन ज़माने देखे,
साथ साथ हमने कई ख़्वाब सुहाने देखे।
हमको बिस्मिल कर के दिल में उतारे थे,
तुम्हारे तीर-ए-नज़र के वो निशाने देखे।
कितने वादे किए थे उल्फ़त में तुमने तो,
दूर जब जाना था तो बनाए बहाने देखे।
बेख़बर अंजाम-ए-उल्फ़त से थे फ़ना हुए,
जलते हुए लौ में शमा से परवाने देखे।
अंधेरे चार सू हैं और दूर तक है तन्हाई,
बिछड़ कर तुमसे हमने सियाह-ख़ाने देखे।
अपने आप से हम समझाते हैं ख़ुद को,
ख़ुद के ही "शमीम" आइना-ख़ाने देखे।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"