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दिलनशीं ये फ़ज़ा रहने दो

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनी ज़ुल्फों को ऐसे ही खुला रहने दो,
        
                                                    
                            
चाँद से चेहरे को थोड़ा सा छुपा रहने दो।

मुस्कुराते हो तुम तो और हसीँ लगते हो,
अपने रुख़सार पे तबस्सुम सजा रहने दो।

साथ तुम हो तो ख़ूबसूरत लगता है समाँ,
और कुछ देर दिलनशीं ये फ़ज़ा रहने दो।

यूँ ही बैठे रहो जी भर के देख लूँ मैं तुम्हें,
और ये तज़्किरा-ए-रस्म-ए-वफ़ा रहने दो।

तुमसे नज़रें मिलाकर बेख़ुदी हो जाती है,
मेहरबाँ हो कर हम पर ये नशा रहने दो।

"शमीम" ज़िद न करो जाने की ठहर जाओ,
वस्ल-ओ-तरब का ये वक्त थमा रहने दो।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
2 महीने पहले
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