दीदार किया हमने तुम्हारा कभी कभी,
यादों में हमने वक्त गुज़ारा कभी कभी।
जब बेख़याली में तुम ने मुझे छुआ तो ,
हमको लगा कोई है इशारा कभी कभी।
बाँकी अदा से देखते हो मुस्कुरा कर तुम,
लगता है शोख़ी-ए-नज़ारा कभी कभी।
यूँ हमसे ख़फ़ा होकर हमको न सताओ,
हो जाता है जिगर पारा-पारा कभी कभी।
तुम सामने हो और मैं तुम्हें देखता रहूँ,
होता है ऐसा दिलकश नज़ारा कभी कभी।
सारे जहाँ कोई भी तुम सा नहीं "शमीम",
लाख़ों में कोई लगता है प्यारा कभी कभी।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"