काश फिर लौटकर वो दौर पुराने आते,
तुम्हारे वस्ल-ओ-तरब के वो ज़माने आते।
मुलाक़ातों के दिलनशीन जो लम्हे गुज़ारे,
फिर से एक बार वही लम्हे सुहाने आते।
मेरा गुलशन बिना तुम्हारे वीरान हुआ है,
मेरे जहाँ में जश्न-ए-बहार सजाने आते।
कोई शिक़वा या गिला था तो ज़ाहिर करते,
ग़लत-फ़हमी कोई थी गर तो मनाने आते।
तुम अगर आते तो रौनक-ओ-रानाई होती,
तुम्हारी राह पर हम फूल बिछाने आते।
"शमीम" इक बार आते और लौट भी जाते,
कुछ मिरी सुनते कुछ तुम्हारी सुनाने आते।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"