आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दौर पुराने

                
                                                         
                            काश फिर लौटकर वो दौर पुराने आते,
                                                                 
                            
तुम्हारे वस्ल-ओ-तरब के वो ज़माने आते।

मुलाक़ातों के दिलनशीन जो लम्हे गुज़ारे,
फिर से एक बार वही लम्हे सुहाने आते।

मेरा गुलशन बिना तुम्हारे वीरान हुआ है,
मेरे जहाँ में जश्न-ए-बहार सजाने आते।

कोई शिक़वा या गिला था तो ज़ाहिर करते,
ग़लत-फ़हमी कोई थी गर तो मनाने आते।

तुम अगर आते तो रौनक-ओ-रानाई होती,
तुम्हारी राह पर हम फूल बिछाने आते।

"शमीम" इक बार आते और लौट भी जाते,
कुछ मिरी सुनते कुछ तुम्हारी सुनाने आते।
-देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर