कल फिर दुनिया ने देखा, भारत का सिर ऊँचा हुआ,
मानवाधिकार परिषद में निर्विरोध नाम हमारा हुआ।
तीन साल का सफर, 2026 से 29 तक का वादा,
ये सातवीं बार है... ये भरोसा नहीं, इरादा है।
कल एनएचआरसी ने फिर याद दिलाया,
रक्षक बनकर कमजोर के साथ खड़ा होना क्या होता है।
22 भाषा में अब गाँव का किसान भी बोल सकता है,
5 लाख CSC से उसकी शिकायत ऑनलाइन टोल सकता है।
हमने कहा - अधिकार कागज पर नहीं, रोटी में होना चाहिए,
पक्का घर, नल का जल, गैस का चूल्हा, इलाज में होना चाहिए।
4 करोड़ घर, 12 करोड़ नल, 80 करोड़ को अनाज,
यही तो असली मानवाधिकार है - भूख और बेघरी का इलाज।
कल हमने ये भी माना, चुनौती अभी बाकी है,
जलवायु, AI, गिग वर्कर का मानसिक स्वास्थ्य बाकी है।
डिजिटल की दुनिया में नफरत और झूठ का अंधेरा है,
पर हम कहेंगे - गरिमा और आजादी से बड़ा कोई पहरा नहीं है।
राष्ट्रपति ने कहा था - "कोई पीछे न छूटे"
हम दोहराते हैं - न्याय, समानता, गरिमा यही नारा है।
मानवाधिकार मतलब हवेली नहीं, झोपड़ी की इज्जत है,
मतलब जेल में भी कैदी का इंसान होना तय है।
तो सुनो दुनिया,
भारत सिर्फ भाषण नहीं देता, जमीन पर उतारता है।
कमजोर के आंसू पोंछना, यही हमारी सरकार है।
कल जो "protect" हुआ वो सिर्फ सीट नहीं थी,
वो 140 करोड़ लोगों की गरिमा की जीत थी।
और ये जीत तब पूरी होगी,
जब आखिरी आदमी भी कहेगा - "मैं इंसान हूँ, और मुझे इंसान जैसा जिया जाएगा"। 🇮🇳
-देव कुमार पटेल