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सावन और भोलेनाथ

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सावन और भोलेनाथ
        
                                                    
                            

सावन आया, घटा छाई,
धरती ने शिव-धुन गाई,
बूंद-बूंद में बम-बम बोले,
कण-कण में भोले मुस्काए।

गले में सर्पों की माला,
जटा में गंगा की धारा,
भस्म रमाए बैठे योगी,
सबके मन को लगे प्यारा।

बेलपत्र, जल का लोटा,
भक्तों की लाइन छोटी-बड़ी,
एक लोटा जल जो चढ़ा दे,
भोले कर दें झोली भरी।

ना सोना चाहें, ना चांदी,
ना महलों की उनको चाह,
एक सच्चे दिल से जो ध्यावे,
भोले हो जाएं उसी के साथ।

डमरू बजे, नंदी नाचे,
सावन का ये महीना पावन,
जो भी आए कैलाशपति के द्वार,
उसका हो जाता है उद्धार, मनभावन।

हर हर महादेव!
2 महीने पहले
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