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कुर्सी का खेल

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कुर्सी का खेल
        
                                                    
                            

वादा है, नारा है, भीड़ में शोर है,
हर चेहरे पर एक नया सा भेष है,
मंच से जो बोले, वो मीठा लगता है,
पर मंच के पीछे कुछ और ही परिवेश है।

गलियों में पोस्टर, दीवारों पर नाम,
हर गली नुक्कड़ पर बस उसी की बात,
भूख की, रोज़गार की, सड़क की बात नहीं,
बस कुर्सी किसकी, यही है सवालात।

कोई कहे देश बदलेगा, कोई कहे हम बदलेंगे,
झंडे का रंग बदल कर सब अपना रंग भरेंगे,
जनता खड़ी है आज भी वहीं, कतार में,
नारे बदल गए, पर सवाल वहीं हैं पड़े।

राजनीति बुरी नहीं, नीयत बुरी हो जाती है,
जब सेवा की जगह सत्ता की भूख जग जाती है,
जिस दिन कुर्सी नहीं, जिम्मेदारी दिखेगी,
उस दिन सच में राजनीति की तस्वीर बदलेगी।
2 महीने पहले
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