विज्ञापन

मनई _मनई एक समान

Dev Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            काहे बाँटेउ मनई कै जाती,
        
                                                    
                            
एकै माटी, एकै थाती।
बड़-छोट कै झूठी बाती,
काहे फैलावौ इहै अँधियाती?

कोई भूखा, कोई फेंके थारी,
एही का कहौ समजदारी?
धनी के द्वारे घी के दीया,
गरीब के घरवा अँधियारी।

राम एक हैं, सबकर साईं,
फिर काहे लड़ी मनई से मनई।
हाथ बढ़ावौ, गले लगावौ,
तबहीं बनिहै गांव-नगरिया सुखदाई।

अम्मा मोरी कोख मा रोवै,
बिटिया जनम सुनि मनवा डोलै।
लोगवा कहिहैं बोझ है आई,
लक्ष्मी आई, केहू न बोलै।

पढ़ै-लिखै का जब जिद करै,
बाबू कहै - चूल्हा सँभारे।
सपना देखै उड़ै अकसवा,
समाज के बंधन पाँव पसारे।

अरे मोरे गांव के लोगौ,
बिटिया का जिन बोझ बतावौ।
बिटिया पढ़िहै, तबहीं बढ़िहै,
देश-गांव का मान बढ़ावौ।

खेतवा मा किसान पसीना बहावै,
दाना-भूसा सबका खिआवै।
मंडी जाई तो दाम न मिलै,
साहूकार घर रोजै आवै।

माटी से सोना ऊ उपजावै,
फिर खुद भूखा काहे सोवै?
इहै व्यवस्था कब बदलिहै,
कब धरती के पूत सुख पावै?
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12492 कविताएं

View Profile

Ankit Kumar

10362 कविताएं

View Profile