वो सूरज से पहले उठता है,
और सूरज के बाद भी सोता नहीं।
हाथ में हल, कंधे पर कर्ज,
आँख में फिर भी फसल का सपना होता है।
न EMI की टेंशन, न छुट्टी का बहाना,
बारिश रुकी तो आंसू, बारिश ज्यादा तो परेशानी।
फिर भी बीज बोता है,
क्योंकि उसे पता है - भूखे पेट क्रांति नहीं होती।
वो कहता नहीं "मैं अन्नदाता हूँ",
पर उसकी एक फसल से 140 करोड़ पेट भरता है।
AC में बैठकर जो "Organic" मांगते हैं,
उसी की मेहनत से उनकी थाली सजती है।
कर्ज आया, ओला गिरा, दाम नहीं मिला,
सरकार बदली, वादे बदले, पर वो नहीं बदला।
टूटकर भी खेत में खाद डालता है,
क्योंकि खेत में ही उसकी इज्जत दफन है।
सुनो दुनिया,
मोबाइल सस्ता हो जाए तो खबर बनती है,
पर किसान की सब्जी 2 रुपये महंगी हो जाए तो हाहाकार मचता है।
पर ये मत भूलो -
जिस दिन किसान ने हल रख दिया,
उस दिन ऑफिस का लैपटॉप भी भूखा रहेगा।
इसलिए सलाम उस मिट्टी के बेटे को,
जो खुद भूखा रहकर देश का पेट भरता है।
जो कहता है "फसल अच्छी होगी, बच्चों को पढ़ाऊंगा",
और उसी उम्मीद पर अगला सीजन बो देता है।
किसान कमजोर नहीं है,
वो धरती का रीढ़ है।
जब तक वो खड़ा है,
देश का भविष्य खड़ा है।
-देव कुमार पटेल