खुद का होकर खुद को पाया,
तो खुद ने खुद से राम मिलाया,
खुद से भाग के कहां जाएगा
तू खुद का खुद ही है हमसाया।
खुद को छोड़ के किसी को पाया
तो खुद से कैसा धर्म निभाया,
जो खुद ही वंचित खुद के प्रेम से
वो फिरेगा फिरता प्रेम सताया।
- देवकरण गंडास "देव"