अदृश्य शक्ति की चमक धमक से
नित चित पटल पर मन की पुकार।
चहुंओर क्षितिज के लंबे छोर पर
आभामंडल डोलती मन के डोर पर
मयूख किरण सी निखरती सौंदर्य
झंकृत वाणी डोल रही सावन बन
हृदय गुफा खुल रही दृग दर्पण से
वेदना के डोर पर प्रेम पनपती रही
खनकती खन खन खिन्न मन सदैव
पुल बांधती रिक्त यौवन में अंबार।
अहो! जीवन यौवन के समतल में
विपुल वैभव के समदर्शी अंचल में
कांपकर उठ रही मन की फुफकार।
वेदना भी करवटें ले रही सिहरकर
खोजती सुखद आनंद की अनुभूति
विकल प्राण खोजती बाट सुगम
निःसंदेह निष्ठुर नीरव नींद के पल
सागर तल से उठती करुण -क्रंदन
शान्त स्वर से वंचित मन की गुहार।
अब अंगड़ाई लेकर घूम रही है
अटल सत्य की परिधि खोज रही है
बरसती सावन सी नैन बरस रही है
घंटी बजा रही मृदुल मन की पुकार।
-देवनन्दन कुमार