विज्ञापन

मलिन मन को त्रान देकर

DEONANDAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मलिन मन को त्रान देकर,
        
                                                    
                            
मुख की आभा जगा रहे हो।
कसक रही थी वेदना स्वर,
तिलक मस्तक लगा रहे हो।।१।।

मातृत्व रूप वात्सल्य लिए,
सत्य स्वरूप निरख रही है।
जीवन रूप उज्जवलता का,
पाकर प्रवेश परख रही है।।२।।

तन वैभव से परिपूरीत कर,
सच दुनियां की दिखा रही हूं।
संचित श्वेत दुग्ध रस पान से,
सुन्दर रचना मैं सजा रही हूं।।३।।

आत्म चिंतन स्वाभिमान से,
सृजित शक्ति मैं लगा रही हूं।
हे शुभे! सर्वस्व ममत्व लिए,
नवांकुर को नित नहा रही हूं।।४।।

मलिन मन को त्रान देकर,
मानव मन को भुला रहे हो।
मां की ममता निर्मल होती,
सुन्दर तन से मिला रहे हो।।५।।
-देवनन्दन कुमार
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all