वैभव विपुल भर दे;
हे श्वेत शारदा! वर दे।
नवल धवल पर नव नव वर दे;
कुंठित कंठ में कोमल स्वर दे।
वैभव विपुल भर दे, हे श्वेत शारदा! वर दे।।१।।
भूषित भाव, विमल स्वभाव;
सुमति सुन्दर, सौम्य स्वर दे;
हृदय हर्षित, हरख हरख कर दे।
वैभव विपुल भर दे, हे श्वेत शारदा! वर दे।।२।।
हे अम्ब! नमन नामित नयन से;
निर्मल निर्मल ज्योति प्रखर दे;
समरूप सद्ज्ञान, सुयश भर दे।
वैभव विपुल भर दे, हे श्वेत शारदा! वर दे।।३।।
कलुषित काया, हे युग योगमाया;
कल्पित कंठ में निज स्वर भर दे;
अगम स्वर पर सुगम स्वर भर दे।
वैभव विपुल भर दे, हे श्वेत शारदा! वर दे।।४।।
विनय विपुल मम, कर तव पद पर;
अर्चन वंदन पर, हे! विभूषित कर दे;
हे माता! अंध द्वार, प्रकाशित कर दे।
वैभव विपुल भर दे, हे श्वेत शारदा! वर दे।।५।।
-देवनन्दन कुमार