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द्रौपदी की लाज।

DEONANDAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            द्युत सभा में हार चुके थे
        
                                                    
                            
राज पाट इंद्रप्रस्थ की
धन वैभव जवाहरात सब
भ्रातृ धन भी धर्मराज ने।
जब लाचार हुए खुद धर्म तब
मामा शकुनि ने सुझाव दिया
अभी तो अमूल्य धन बांकी है
अंतिम दांव चलकर खोया हुआ
सब वैभव वापस ले लो।
बोले पति के संकट पर पत्नी
काम आती है, अंतिम दांव भरो।

सब उल्टा चल रहा था
विधि विपरीत हुआ जब
अर्धांगिनी भी गवां बैठे
दास हो गए दुर्योधन के
युवराज ने दुश्शासन को निर्देश दिया।
कहां है मेरी दासी? देखूं मैं जरा
फिर क्या था? लाई गई द्रौपदी
बीच सभा में चीर हरण की लीला
सोच मत दुश्शासन चीर खींच लो।

लाज बचाने को चीख चीत्कार किया
बड़े बड़े सुरमा की आँखें नीचे हुई
सामने विकर्ण विरोध किया, गलत है
पर यह पर्याप्त नहीं था
याज्ञसेनी की पुकार अनसुनी सभा में
अंतर्मन से कहने लगी, हे ईश्वर!
हे गोविंद, गिरिधर नागर, लाज बचाओ।

माधव मन कांप गया, गला रूंध गया
अनर्थ, भीषण अधर्म, मेरा अपमान है।
दशा देख मुरलीधर ने धीरे कहा, सखी
मैं यहाँ हूं यह तेरी नहीं मेरा अपमान है।
योगमाया का विस्तार हुआ, चकित सब
चीर हरण में चीर ही चीर सब हैरान हुए।
चीर के ढेर पर लेट गया स्वाभिमान है
स्तब्ध थे सब के सब सिंहासन हिल गए।

कुछ क्षण बाद क्रोधयुक्त हुईं याज्ञसेनी
तीव्र अनल में राख होंगे सब पल भर में।
महारानी गांधारी का आगमन हुआ जब
देख क्रोधित हुईं बोली मुर्दे हैं सब घर में।
लो, चीर हरण कर लो मेरी स्त्री कुछ नहीं
महाराज भयभीत कंपित थर थर स्वर में।
नहीं? नहीं ये नहीं होगा बेटी पास आओ
लो, मांगो जी भरकर, सब जो तेरे वर में।

ईश्वर माया ने लाज बचाई घबरा गए सब
हारा हुआ वापस हुआ सब, लज्जित थे।
ईश्वर की असीम अनुकंपा से शान्त चित्त
मृदुल मन सुख पूर्वक समाज सज्जित थे।
- देवनन्दन कुमार
3 महीने पहले
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