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हुस्न का सम्मोहन

DEEPAK PRAJAPATI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            है आँखों में कजरा वो कानों में बाली,
        
                                                    
                            
दीवाना बनाए ये सूरत मत वाली।

है गालों पे तिल और होठों पे लाली,
मोहब्बत की दुनिया इसी ने सँभाली।

खनकती है हाथों में काँच की चूड़ी,
अक्लमंदों की अक्लें ये हरने ही वाली।

जबीं पर चमकती है सुर्ख़ सी बिंदी,
अँधेरी सी शब में उजाला वो ढाली।

झुकी पलकों से वो जो तिरछी नज़र है,
अच्छे अच्छों को पागल बना देने वाली।

हया से झुकी आँख आहिस्ता सरके,
जान ले लेगी ढा के ये आफ़त निराली।

रची हाथ में जो हिना महके ऐसी,
कि मजनू बना दे ये ख़ुशबू निराली।

sजाए जो वो हुस्न का एक मक़्तल,
तो रूहों को पागल बना देने वाली।

हुआ इस कदर आज 'दीपक' दीवाना,
कि दिल में 'अलक' इश्क़ की जगा ली।
एक महीने पहले
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