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मेघ मल्हार : धरती का श्रृंगार

Deepak Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तपते वैशाख की तृष्णा का, जब टूट गया धीरज अंतिम,
        
                                                    
                            
तब श्याम घटाओं ने आकर, नभ पर बाँधा वैभव अप्रतिम।
यह जल-कण नहीं, यह अम्बर के, अंतर का द्रवित समर्पण है,
यह प्यासी-तपती धरती का, मेघों से प्रथम मिलन-क्षण है।

रणभेरी सी घन-गर्जन सुन, चमकी जब चपला अम्बर में,
जैसे जीवन का नव-स्पंदन, जाग उठा सूने बंजर में।
यह शोर नहीं, यह सदियों के, सूखे कंठों का गायन है,
इस झुलस रही वसुंधरा पर, नव-सृष्टि का यह सावन है।

जब सौंधी-सौंधी माटी से, उठती है बचपन की सुवास,
तब यादों के सूने पथ पर, जग उठता है फिर से उल्लास।
कागज़ की कश्ती, सावन के, झूलों की वह भूली क्रीड़ा,
तुम धो देती हो एक पल में, मानव के मन की हर पीड़ा।

तुम ऊँच-नीच के भेदों को, अपनी धारों में धोती हो,
निर्धन के खपरैलों पर भी, तुम मोती बनकर रोती हो।
जब व्याकुल कृषक निहार रहा, सूनी आँखों से नभ की ओर,
तुम करुणा बनकर बरस पड़ीं, ले अन्नपूर्णा का उपहार।
हे महासृजन की सूत्रधार! हे नीरद-नंदिनी कल्याणी!
तुमसे ही प्राणों का स्पंदन, नव-अंकुर में गूँजी वाणी।
तुम अम्बर और वसुंधरा के, पावन परिणय की बेला हो,
मुरझाए से इस कानन में, तुम नव-जीवन का मेला हो।

तुम मात्र प्रकृति का क्रम नहीं, तुम सजल-सुवासित कविता हो,
मरुस्थल के सूखे होंठों पर, तुम बहती जीवन-सरिता हो।
जब तक तुम रस की धार न दो, यह धरा मात्र एक भस्म-कण है,
यह रूप तुम्हारा हे वर्षा! शिव के मस्तक का चंदन है।
- दीपक कुमार मिश्र
2 महीने पहले
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