विज्ञापन

मंज़िल चार कदम दूर

Deepak Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            माना सफ़र लंबा है,
        
                                                    
                            
इसलिए शरीर पसीने से लथपथ ज़रूर है,
थककर मत बैठ जाना ऐ दोस्त,
मंज़िल बस चार क़दम दूर है।

माना राह में काँटे हैं,
और हर मोड़ पर इम्तिहान ज़रूर है,
हौसलों को कमज़ोर मत पड़ने देना,
तेरी जीत का सपना अभी भरपूर है।

माना वक़्त की मार है,
और किस्मत भी तुझसे थोड़ी-सी दूर है,
हारकर बैठ गया जो तू बीच राह में,
फिर शिकायतों का क्या क़ुसूर है?

माना अँधेरा घना है,
और उजाले का होना अभी ज़रूर है,
अपने भीतर उम्मीद का दीप जला,
हर रात के आगे सवेरा ज़रूर है।

माना गिरकर सँभलना आसान नहीं,
पर कोशिशों का अपना ही सुरूर है,
जो चलता रहा मुश्किलों के बावजूद,
उसके क़दमों में ही जीत का नूर है।

माना दुनिया सवाल उठाएगी,
और ताने सुनना भी दस्तूर है,
अपने कर्मों पर भरोसा रखना,
तेरी ख़ामोशी का जवाब देना ज़रूर है।

माना अपने भी रूठ जाएँगे,
और अपनों से मिलना भी दूर है,
दिल में नफ़रत को जगह मत देना,
मोहब्बत ही सबसे बड़ा ग़ुरूर है।

माना मंज़िल अभी धुँधली है,
और आँखों में सपनों का हुजूम भरपूर है,
नज़रें अपने लक्ष्य पर टिकाए रखना,
तेरी कोशिशों में ही जीत का नूर है।

माना कई बार टूटेगा हौसला,
और आँखों में आँसुओं का दस्तूर है,
हर आँसू को अपनी ताक़त बना लेना,
तेरे भीतर भी एक समंदर ज़रूर है।

माना सफ़र में देर होगी,
पर मेहनत का फल मिलना ज़रूर है,
जो धैर्य के साथ बढ़ता जाएगा,
उसके लिए खुलना हर बंद दरवाज़ा ज़रूर है।

माना मंज़िल तक पहुँचने में,
अभी कुछ और चलना ज़रूर है,
राह में रुकना नहीं मेरे दोस्त,
मंज़िल बस चार क़दम दूर है।
- दीपक कुमार 'दीप',
 
16 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dr fouzia

6957 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13466 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7504 कविताएं

View Profile