इस दुनिया की भीड़ में शामिल तो हूं,
फिर भी गुमनाम सी क्यों हूं।
नज़रें तो कई टिकी हैं मुझ पर,
फिर भी नजरअंदाज क्यों हूं।
हैं तो कई अपने, खुद में व्यस्त,
फिर भी अनदेखी सी क्यों हूं।
लफ़्ज़ तो मेरे पास भी हैं बहुत ,
फिर भी गुमसुम सी क्यों हूं ।
दिल की कहा हमेशा सुनती हूं,
फिर भी गुनाहगार क्यों हूं।
जीवन और उम्मीद थमता नहीं,
फिर भी वक्त की आस में क्यों हूं।
इस दुनिया की भीड़ में शामिल तो हूं,
फिर भी गुमनाम सी क्यों हूं।
----- दीपा सिन्हा