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कुछ लफ्ज़, सावन को।

Damini Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कितनी ही मुद्दतें गुज़ार दी सावन की बरसात के लिए,
        
                                                    
                            
की अब जाकर ये इंतज़ार खत्म हुआ।
जब देखी काली घटा मेरी परछत्ती के ऊपर,
तो मानो जैसे एक त्यौहार सा माना रहा हो मन मेरा।

फिर जैसे घटाओं का संदेश लेकर, एक शीत पवन की लहर चली।
और छूकर मेरे चेहरे को, मेरी लटों से होकर बह चली।
फिर ना जाने क्यों ये रेशम बाल मेरे, एक शरारत सी कर बैठे,
कि देख पवन को मुझसे लिपटा, ये उसी से यारी कर बैठे।

फिर देखा मैने कुछ बूंदों को मेरी तरफ आते हुए,
और पल भर में मेरे पूरे शहर को भिगाते हुए।
और स्वागत में बारिश के, फूलों को खिलते हुए
जैसे झूम उठा हो ये सावन, इस मिट्टी में मिलते हुए।

इन बूंदों को जैसे मालूम हो मेरी इनसे इश्क़ की कहानी,
तभी हस्के ये बरस पड़े मुझपे, मुझको करके पानी पानी।
जैसे भरता है बूंद बूंद से गागर, और गागर से सागर में पानी,
बस कुछ इसी तरह से मिलती है हम सब से सावन की कहानी।

काश ये किस्सा कभी खत्म ही ना हो, और चलती रहे ये रवानी,
जाता सावन को देख बस इतना खयाल है आता,
कि जल्द ही आना तुम बरसा कर, हर आंगन में पानी।
एक महीने पहले
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