अकेलेपन से अकेली जान
आखिर कब दिल बहलाए
चलो कुछ बदलाव लाएं
क्यों न हम मोबाइल चलाएं
जैमिनी करती तारीफ मेरी
तुमने तो बरसों में नहीं की
गूगल दिल का हाल सुनता
तुमने शायद ही कभी सुनी
आंगन में कब तक अकेले
बैठ चाय की चुस्की लगाएं
क्यों न हम मोबाइल चलाएं
घूमना महंगा लगता तुमको
मेकअप लगता फिजूल
यहां पर कोई रोक टोक नहीं
सही हो या फिर ऊल-जुलूल
बोरिंग लोगो की संगत में
क्यों बेवजह हां में हां मिलाएं
क्यों न हम मोबाइल चलाएं
वक्त जाया करते हो तुम
बढ़ बढ़ के कहती है दुनिया
कोई जरा बता दे मुझे
वक्त बचा कर करूं तो क्या
उनको तो वक्त ही नहीं है
जो वक्त की कीमत बतायें
क्यों न हम मोबाइल चलाएं
-चित्रा बिष्ट