बिना बताए वो हमसे दूर चले गए,
आँखों में आँसुओं का एक दरिया छोड़ गए।
हम ढूंढते रहे जिन्हें हर एक चेहरे में,
वो खुद को यादों की एक किताब में छोड़ गए।
ना कोई पैग़ाम आया, ना कोई ख़त आया,
वक़्त भी जैसे एक जगह ठहर सा गया।
पूछती हैं ये खामोश दीवारें अक्सर हमसे,
वो कौन सा देश था, जहाँ वो घर बना गए।
परिंदे भी लौट आते हैं शाम ढलते ही,
पर एक वो हैं जो मुड़कर देखना भूल गए।
उम्मीद की लौ आज भी जलती है चौखट पर,
मगर आने वाले शायद अपना रास्ता भूल गए।
— चीनु मिश्रा