स्क्रीन की जगमगाती रोशनी में,
हर चेहरा यहाँ मुस्कुरा रहा है।
पर बंद कमरों के सन्नाटे में,
हर दिल थोड़ा छटपटा रहा है।
हजारों 'फॉलोअर्स' की भीड़ में,
अकेलापन ही सच्चा हमराही है।
दिखावे के इस बाज़ार में,
सादगी की हुई रुसवाई है।
फिल्टर से चमकाई गई तस्वीरें हैं,
सच कहीं परदा-नशीं बैठा है।
मुस्कुराहटें तो सब ऑनलाइन हैं,
अश्क ज़मीन पर आ गिरा बैठा है।
लाइक्स की गिनती से तय होती है हस्ती,
अल्फ़ाज़ अब बेमायने से लगते हैं।
चारदीवारी में रहने वाले लोग,
अब दिल की दीवारें चुनने लगते हैं।
इंसानों की इस चमकती दुनिया में,
हकीकत कहीं खोती जा रही है।
बाहर सब कुछ शांत दिखता है,
अंदर इंसानियत रोती जा रही है।