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भीड़ सगी नहीं

chinu mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शहर की सड़कों पर दौड़ता, ये चेहरों का दरिया है,
        
                                                    
                            
पर सच तो ये है कि यहाँ हर शख़्स तन्हा है।
हज़ारों कंधे टकराते हैं, एक-दूजे के पास से,
पर कोई नहीं पूछता हाल, ज़रा से अहसास से।

ये तालियाँ जो गूँजती हैं, बस वक्त की मोहताज हैं,
आज तुम्हारे नाम की हैं, कल किसी और का आगाज़ हैं।
भीड़ का अपना कोई चेहरा, कोई ठिकाना नहीं होता,
मुश्किल में हाथ थाम ले, ऐसा इसका ज़माना नहीं होता।

जब सूरज ढलने लगता है, परछाइयाँ भी साथ छोड़ देती हैं,
ये भीड़ तो बस तमाशबीन है, रुख हवा का मोड़ देती है।
मत ढूँढना इसमें अपनों को, ये बस एक शोर है,
दिखती तो साथ है मगर, खींचती अपनी ही ओर है।

याद रखना 'अकेले चलना' ही असली पहचान है,
भीड़ का हिस्सा बनना तो बस एक आसान गुमान है।
जो खुद के करीब है, वही असल में जीता है,
वरना ये भीड़ तो बस, वक्त और वजूद को पीता है।


 
2 महीने पहले
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